उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में जमीन अधिग्रहण का खेल जारी है. कभी एक्सप्रेस वे के नाम पर तो कभी सुव्यवस्थित शहर बनाए जाने के नाम पर. मजे की बात तो यह कि अधिग्रहित जमीन को सरकार करीब 10 गुणा ज्यादा दर पर बिल्डरों को बेच रही है.
इससे पहले यूपी की सपा सरकार ने स्पेशल इकोनॉमी जोन के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों को जमींदार बना चुकी है. जिस काम के लिए जमीन लिया गया था अभी तक तो वह काम नहीं हो पाया... लेकिन लगता है बसपा सरकार की सोच इस मसले पर सपा से अलग है. सरकार जमीन एक्सप्रेस वे (यमुना, गंगा जैसे एक्सप्रेस वे) के नाम पर ले रही है. जाहिर सी बात है सड़क के दोनों ओर विकास के काम होंगे और यह काम कोई न कोई कंस्ट्रक्शन कंपनी ही करेगी.
खैर यह तो सरकार की परेशानी है. फिलहाल किसानों की परेशानी उसे मिलने वाली रकम को लेकर है. प्रशासन अपने कानून को लेकर और किसान अपनी जमीन को लेकर अड़े हुए हैं. इसी बीच नेताओं को अपनी जमीन दिखने लगी है. कई नेताओं को वहां की जमीन पर खेती करने का मौका भी मिल गया है. फसल 2012 में कटेगी जब राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे. इसके लिए लगभग सभी राष्ट्रीय या स्थानीय दल जी जान से जुट गए हैं. आप इसे कह सकते हैं कि सभी लोग विकास के काम में लग गए हैं.
इस विकास की दौर में क्या कुछ और बेहतर नहीं हो सकता, मसलन सरकार विकास के नाम पर दलाल की भूमिका निभाना छोड़कर जमीन किसानों की सहमति से ले और उसे उसी दर पर भुगतान करवाए जिस दर पर वह बिल्डरों को दे रही है? पता नहीं यह कितना व्यवहारिक होगा लेकिन मेरे विचार से कुछ ऐसा जरुर होना चाहिए.
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